भगवान शिव को खुद को बचाने के लिए अपने भक्त से क्यों भागना पड़ा?

भगवान शिव को खुद को बचाने के लिए अपने भक्त से क्यों भागना पड़ा?

भक्त और भगवान का रिश्ता भी गजब का होता है।खासतौर पर शिव तो बड़े ही भोले हैं,उन्होंने अपने भक्तों में कभी भी भेद भाव नहीं किया जिसने भी सच्चे मन से उन्हें पुकारा प्रभु दौड़े चले आये,चाहे वह एक नंबर का दुष्ट हो या परम सात्विक तपस्वी।चाहे वो मनुष्य हो देव हो या फिर राक्षस और इसी बात का राक्षसों ने सदा ही लाभ उठाने की कोशिश की है| भगवान् शिव के इस भोलेपन की वजह से कुछ ऐसे भी घटनाएं हुईं है कि सुन कर हंसी आती है|भस्मासुर नामक एक राक्षस भी था जो सारे ब्रम्हाण्ड पर राज करना चाहता था|उसे भोलेनाथ के भोलेपन के बारे में पता चला उसने सोचा क्यों न इनकी तपस्या की जाये जल्द ही ये प्रसन्न होकर मनचाहा वर दे देंगे|

जब शिवजी उसके तप से प्रसन्न हुए तो उसने उनसे अमरता का वरदान माँगा।

भस्मासुर बहुत देर तक अपनी मांग पर अड़ा रहा परन्तु शिव नहीं माने।उन्होंने कहा कि धरती का कोई भी प्राणी अमर ही हो सकता।यह प्रकृति के विरूद्ध है।

हारकर उसने अपनी मांग बदल ली और कहा की मैं जिसके सर पर हाथ रखूँ वो जलकर भस्म हो जाए|

इसपर शिव ने कहा ठीक है तुम जिस किसी के सर पर हाथ रखोगे वो उसी क्षण राख में बदल जायेगा|भस्मासुर को यकीं नहीं हुआ की शिव ने उसे सच में ये वरदान दे दिया है अतः उसने सबसे पहले शिव के सर पर हाथ रख कर आजमाने की सोची|

परन्तु शिव भी उसके मन की बात समझ चुके थे और अपना दिया हुआ वरदान वापस नहीं ले सकते थे इसलिए उन्हें वहाँ से भागना पड़ा|

उसके बाद उन्हें भगवान् विष्णु का ध्यान आया उन्होंने चक्रधारी का स्मरण किया भगवान् विष्णु के आते ही उन्होंने उन्हें सारी बात बताई और छुटकारे का उपाय करने को कहा| इसपर विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और भस्मासुर के सम्मुख पहुँच गए|

भस्मासुर उनकी सुन्दरता देख कर मोहित हो गया और उनसे पूछा क्या तुम मुझसे विवाह करोगी तो मोहिनी रूप धारण किये हुए विष्णु जी ने कहा मैं नर्तकी हूँ और नर्तक से ही विवाह करुँगी| इसपर उसने कहा अगर तुम मुझे सिखाओ तो मैं अच्छा नृत्य कर सकता हूँ मोहिनी ने कहा ठीक है जैसे मैं करती हूँ वैसे करो| भस्मासुर ने मोहिनी का अनुकरण करना शुरू कर दिया और इसी क्रम में उसने अपना हाथ अपने ही सर पर रख लिया और शिव के वरदान के कारण खुद ही जलकर भस्म हो गया|

झ्स कहानी से यही स्पष्ट होता है कि जो भी ईश्वर से माँगा जाए,वह देर सबेर मिलता अवश्य है किन्तु वह किसी दुर्भावना या गलत कर्म के लिए माँगा जाए तो वह प्राप्ति भले ही हो जाए,तो भी उसका फल किसी भी हालत में सकारात्मक नहीं हो सकता।

इक लख पूत सवा लख नाती,ता रावण घर दिया न बाती।शिव के दिए वरदान का ग़लत फ़ायदा उठाने की वजह से उसका इतना बड़ा परिवार होने के बावजूद कोई नामलेवा न बचा।

भस्मासुर और रावण दोनों के साथ साथ बहुत से दुष्टों को भगवान शिव ने उनकी तपस्या से रीझकर खूब सारे वरदान और अस्त्र शस्त्र दिए।इतना भी न सोचा कि इसका सृष्टि को कितना भयावह दुष्परिणाम भोगना पड़ सकता है!

साथ ही साथ उनकी दयालुता के फलस्वरूप ऐसे शक्तिशाली बन गए राक्षसों को मारने के लिए भगवान विष्णु को अवतार लेने पड़े।

रावण अति शक्तिशाली था।शिवजी के ही वरदानस्वरूप उसने काल को अपने पलंग के पाए से बाँध रखा था,

जब राक्षसों के सिमरन पर शिव रीझ सकते हैं तो हमारे सिमरन से क्यों ईश्वर नहीं रीझेंगे?

नोट – प्रत्येक फोटो प्रतीकात्मक है (फोटो स्रोत: गूगल)

[ डि‍सक्‍लेमर: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है. The Hindu Media वेबसाइट या पेज अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

kavya krishna

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